Wednesday, 17 January 2018

आईने पे चिपकी लाल बिंदी

चाँद मेरी चौखट पे नंगे पावं खड़ा है|
आसमानी झरोखे से छुपा कर,
घर के अंधेरे कमरों के लिए
मुट्ठी भर रोशनी ले आया है.

रंगीन तस्वीरों में क़ैद किससे,
और लिफाफो मे में छिपी कवितायें
ग़ज़लों की तरह आज भी मेरे घर के,
खामोश कोनों में गूँजती हैं|

रोज़ बरोज़ जब खुद को थपथपा के
सोने की नाकाम कोशिश करती हूँ...
महीन धागों जैसी तुम्हारी यादें,
आँखों से नींद उड़ा देती है|

आईने पे चिपकी लाल बिंदी,
तुम्हारी याद दिलाती है.
बिस्तर के सिरहाने रखी माँ की साडी,
हर रात लोरियाँ सुनाती है.|

चाँद मेरी चौखट पे नंगे पावं खड़ा है,
आसमानी झरोखे से छुपा कर,
घर के अंधेरे कमरों के लिए
मुट्ठी भर रोशनी ले आया है|

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